मेरे अल्फाज - हेमा शर्मा


मेरे अल्फाज

जिंदगी एक अहसास है, इसे जी भर कर जीने दो, यह अगर ज़हर भी है, तो इसे हंस कर पी लेने दो..., क्योंकि ये पल ही तो होते हैं, जो कभी लौट कर वापिस नहीं आते..., जैसे गए परिंदे कभी घर वापिस लौट नहीं पाते..., प्यार हो जाए कभी रुस्वा तो उसे मना नहीं पाते..., इसी तरह कितने ही अहसास और पल हैं, जो कहानियों में ढल जाते हैं और कोरे सफेद पन्नों पर काले शब्द बिखर कर भावनाओं का इंद्रधनुष बन जाते हैं। कहानियां जो दिल को गुदगुदाती भी हैं, कहानियां जो आंखों से सावन-भादों बरसाती भी हैं। कुछ कहानियां यादों के गलियारे में ले जाती हैं, तो कुछ सोचों के समुद्र में डुबो जाती हैं। 
 ऐसी ही कुछ कहानियों का कारवां ले कर मेरी दूसरी पुस्तक कहानी संग्रह  'वो अजनबी...' आई, जिसमें मैंने दिल के हर तरह के अहसास को पिरोने की कोशिश की है। मेरी पहली पुस्तक काव्य संग्रह 'मैं  अनजान हूं ...' में  भी दिल की भावनाएं नजर आती हैं।
लोग अक्सर मुझ से यही पूछते हैं कि मैं अपनी पुस्तकें लाने में देर क्यों कर देती हूं, तो मेरा जवाब यही होता है कि मैं आपको हर बार उम्दा साहित्य ही सौंपना चाहती हूं, ताकि उसे पढ़ते हुए आप ख्यालों की दुनिया में खो जाएं।
कभी कल्पनाएं तो कभी घटनाएं लेखक की लेखनी से कहानी का रूप ले कर, जब कागज की धरा पर उतरती हैं, तो पढऩे वालों के मन में भावनाओं की एक मोहक ब्यार छोड़ जाती हैं। मेरे कहानी संग्रह में प्रायश्चित, अनोखा मिलन, नायक, नई मंजिल, दीपक, दहेज की बलि, टूटते रिश्ते, बेटी, प्रेरणा एवं घुंघरू जैसी अनेक कहानियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कुदरत का कानून... तो मेरी ऐसी कहानी है, जिस पर मैं सन 2014 में नाटक भी खेल चुकी हूं तथा यह दर्शकों द्वारा विशेष रूप से पसंद किया गया था।
आज दिलों से जिस प्रकार संवेदनाएं खत्म होती जा रही हैं तथा रिश्तों से प्यार खत्म होता जा रहा हैं, वहां कहीं कहीं हम यह सोचने पर भी मजबूर हो जाते हैं कि प्यार जो कि हर रिश्ते का आधार है और जीवन की सबसे खूबसूरत भावना है, यदि वही खत्म हो गई, तो जीना कितना मुश्किल हो जाएगा। मशीनी जीवन जीते-जीते जब हम खुद ही मशीन बन जाएंगे, तो ना दिलों में प्यार जागेगा और ना ही कोई हमारे टूट कर बिखर जाने की स्थिति में हमारे दिलों पर प्यार का मलहम लगाएगा..., जब हम खुद ही दूसरों को दर्द देंगे, तो फिर हमारे दर्द की दवा कौन बन पाएगा...
दोस्तो, जीवन बिल्कुल तन्हा रह कर नहीं जिया जा सकता, तो फिर आओ सहेज लें जीवन का हर रिश्ता, भले ही वह कितना ही मामूली क्यों ना हो..., उस प्यार और संवेदना को बचाना बेहद जरूरी है, जिससे हमारी भावी पीढ़ी अनजान रह सकती है, जिसे वह आज हमारे ही दिलों से लुप्त होते हुए देख रही है।
हेमा शर्मा

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