खो गई हैं मां की लोरियां...
रात होती थी तो अपने आंचल में
छुपा कर जब मां अपनी मीठी आवाज में लल्ला-लल्ला लोरी, दूध की कटोरी... या फिर चंदा मामा दूर के... या आजा निंदिया आजा, नैनन बीच समा जा... सुनाया करती थी, तो नन्हे मुन्ने की आंखों में सच में नींद आ जाती थी और वह कब सपनों की दुनिया में पहुंच गया पता ही नहीं चलता था, परंतु आज के दौर में अपने ही काम में व्यस्त रहती मां के पास बच्चे को लोरी गा कर सुलाने के लिए वक्त ही नहीं है। आज बच्चे टीवी देखते हुए या मोबाइल पर चलती लोरी को सुन कर सो जाते हैं और मां भी चैन की सांस लेती है, चलो अच्छा हुआ कि यह सो गया। ऐसा नहीं है कि लोरी न सुनाने से मां की ममता कम हो जाती है, परंतु यह सच है कि बचपन में मां से सुनी लोरी सारी उम्र कानों में मीठा रस घोलती रहती है और जब नींद नहीं आती तो चुपके से वह यादों के झरोखे से निकल आपको सुला जाती हैं।बचपन भी खो गया
अब तो जैसे बचपन भी खो सा गया है कहीं, जो कि खोजने पर भी नहीं मिलता, पर याद आता है, नन्हे कदमों से दूर तक खेलने निकल जाना, बगीचे में जा कर आम और अमरूद तोडऩा, दोस्तों के साथ लडऩा और झगडऩा, मिट्टी में खेलना और रात को मां की गोद में सिर रख कर उसकी लोरी सुनते हुए सो जाना, पंरतु आज की पीढ़ी को वीडियो गेम्स, टीवी और मोबाइल से ही फुर्सत नहीं मिलती और इन्हीं के साथ देर रात तक जागते हुए ये कब सो जाते हैं, इन्हें खुद भी पता नहीं चलता।
क्या याद करेंगे बच्चे
हमें आज भी याद आता है कि जब नींद नहीं आती थी तो मां बड़े प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए जब लोरी सुनाती थी, तो नींद पल में आ जाती थी, ऐसा लगता था कि जैसे हम चांद-तारों की दुनिया में हों और दिनभर की सारी थकान उसकी मीठी आवाज को सुन कर गायब हो जाती थी।
हम आज भी सोचते हैं कि काश मां अभी भी हमें लोरी गा कर सुला दे, तो बचपन ही लौट आए, परंतु ये बच्चे जब बड़े होंगे तो इनके पास कहां ये यादें होंगी और किसी गेम या कार्टून को यह याद करेंगे अपनी आंखों में नींद लाने के लिए।
लोरी जरूर सुनाएं
आप भले ही कितनी ही व्यस्त क्यों न हों, अपने बच्चे को लोरी गा कर सुलाने का प्रयास करें। लोरी गाने के लिए आपको संगीत का विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं है, भले ही आवाज कैसी भी क्यों न हो, बच्चे के मन पर वह जादूई असर छोड़ती है, सो इन लोरियों को किसी भी कीमत पर खोने न दें, क्योंकि यह तो एक ऐसी प्यारी सी परंपरा है, जो नानी से मां को मिली और मां से हम तक आनी ही चाहिए और इसे जिंदा तभी रखा जा सकता है, जब भावी पीढ़ी के कानों में भी ताउम्र मां की लोरी गूंजती रहे।
hema harma

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