जिंदगी की पाठशाला के गुरु ( हेमा शर्मा )

हर शख्स एवं परिस्थितियां हैं गुरु

गुरु शब्द सुनते ही हमारे मस्तिष्क में छवि बनती है उन शिक्षकों की जिनसे हमने स्कूल या कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की हैं, परंतु इनके अलावा हमारे जीवन में वे लोग एवं परिस्थितियां भी गुरु की भूमिका निभाते हैं, जिनसे हमें कुछ न कुछ सीखने को मिलता है, फिर चाहे वह नन्हा बच्चा या कुदरत की कोई घटना ही क्यों न हो। यदि वे भी हमें भटकाव से सही राह पर ले आएं तो वे भी हमारे गुरु ही कहलाएंगे।

हर पल नया हैं सीखते

अर्जुन, एकलव्य और द्रोणाचार्य जैसे गुरु-शिष्य के कई उदाहरण हमारे सामने हैं। स्टूडैंट लाईफ में ही नहीं बल्कि जीवन के हर पथ पर हमें कोई न कोई ऐसा व्यक्ति मिलता ही है, जो हमारे जीवन में एक साकारात्मक परिवर्तन लाता है। सही अर्थों में देखें तो हम अपने दोस्तों तथा भाई-बहनों से भी हर रोज कुछ न कुछ सीखते ही हैं, तो वे भी हमारे गुरु ही हुए।

वास्तव में आदमी हमेशा ही स्टूडेंट बना रहता है, भले ही वह नौकरी या बिजनेस कुछ भी करे, अपने सहयोगियों में उसे हमेशा ही अपने सहपाठी एवं गुरु नजर आते हैं। खेल के क्षेत्र में कोच ही गुरु की भूमिका निभाते हैं। बिजनेस में आपके क्लाइंट भी गुरु बन आपको कुछ नया सिखा आगे बढऩे को प्रेरित करते हैं।

कोई नहीं है कम्पलीट 

ऐसा तो पॉसिबल ही नहीं हो सकता कि जीवन में कभी हम स्टूडैंट लाईफ से नाता तोड़ सकें। कभी भी कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, उसे किसी न किसी से, कुछ न कुछ सीखना ही पड़ता है। कभी संतान, तो कभी जीवन साथी, कभी मित्र तो कभी सडक़ पर चलता कोई भी आदमी भी आपके लिए गुरु की भूमिका निभा सकता है। 

हाल ही में मैंने सडक़ पर देखा कि एक बुजुर्ग कोचिंग के लिए जा रही एक लडक़ी की मदद कर रहे थे। उस लडक़ी की स्कूटी का पेट्रोल खत्म हो गया था। वह उसकी  स्कूटी को धकेलते हुए पेट्रोल पंप तक ले जाने की कोशिश कर रहे थे। उनसे भी यह सीखने को मिला कि मुश्किल में पड़े व्यक्ति की मदद करने का जज्बा क्या होता है। वास्तव में परेशानी कोई भी हो कोई हमारी मदद करने वाला आ जाए तो मुश्किल की घड़ी आसान हो जाती है। 

कुम्हार है गुरु

जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी के घड़े को मजबूत करने के लिए अंदर से सहारा दे कर ऊपर से चोट मारता है, उसी प्रकार गुरु की भूमिका बहुत ही चुनौतीपूर्ण होती है। उसे गुरु के साथ-साथ हमारे माता-पिता की भूमिका भी निभानी होती है। इन जिम्मेदारियों के साथ ही हमें शिक्षित और संस्कारवान बनाना भी गुरु की जिम्मेदारी है। ऐसा केवल स्कूल में ही नहीं बल्कि कई बार हमारे मित्र एवं बॉस भी करके हमें नए परंतु खूबसूरत आकार में ढालने का प्रयास करते हैं।

मुकाम से गुरु को मिलती खुशी

देखा जाए तो गुरु बदले में हमसे कुछ नहीं चाहते हैं, उन्हें तो बस हमारी तरक्की और खुशहाली चाहिए। उन्हें जब भी यह खबर लगती है कि उनका अमुक छात्र इस मुकाम पर पहुंच गया, तो उन्हें इस खबर से ही सारी खुशियां मिल जाती हैं, लेकिन बदले में इन्हें हम क्या देते हैं। स्कूल-कॉलेज टाईम में हम उनके निक नेम रख देते हैं, फिर कई बार तो उनके वास्तविक नाम याद करने के लिए हमें ही दिमाग पर जोर डालना पड़ता है।

आदर करें उनका

एक बात हमेशा याद रखें कि गुरु आखिर गुरु होते हैं। उनके प्रति हमेशा आदर और श्रद्धा का भाव रखें। जीवन में कभी भी उन्हें याद कर के देखें, इससे आत्मिक ही सुख मिलेगा। 


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