खुद को बदलना होगा
कहीं तो कमी है
शिक्षक को हम विद्या का वरदान देने वाले भगवान का दर्जा देते आए है। उनके प्रति हमारे मन में असीम आदर एवं सम्मान छिपा होता है तभी तो शिक्षक भी ज्ञान के साथ प्यार और स्त्रेह की बरसात करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि छात्र अपने ही शिक्षकों के साथ या शिक्षक अपने ही छात्रों के साथ इस प्रकार का व्यवहार कैसे कर सकते हैं, इसे बदलते वातावरण का दोषी माना जाए या फिर घर से मिलने वाले संस्कारों की कमी समझा जाए, जो वे जरा-जरा सी बात को ईगो बना लेते हैं।
शिक्षक का महत्व
शिक्षक दिवस का सही महत्व समझने के लिए सबसे पहले इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि आप एक स्टूडेंट हैं अर्थात उम्र एवं अनुभव में अपने शिक्षक से काफी छोटे हैं और फिर हमारे संस्कार भी हमें यही सिखाते हैं कि हमें अपने से बड़ों का आदर करना चाहिए। अपने गुरू का आदर-सत्कार करते हुए, उनकी बात को ध्यान से सुनना और समझना चाहिए। अगर आपने अपने क्रोध एवं ईष्र्या को त्याग कर अपने अंदर संयम के बीज बोए तो निश्चित ही आपका व्यवहार आपको बहुत ऊंचाइयों तक ले जाएगा।
शिक्षक को भी इस बात को समझना होगा कि घर से बाहर बच्चे उनसे शिक्षा लेने आते हैं, सो उन्हें सुरक्षित एवं स्नेहभरा वातावरण देनेे की हर शिक्षक की जिम्मेवारी है।
किसी दिन की जरूरत नहीं
यूं तो सही मायने में देखा जाए तो गुरु: देवो भव: के आध्यात्म को मानने वाले देश में शिक्षकों के प्रति आदर एवं सम्मान व्यक्त करने के लिए किसी एक दिन की जरूरत नहीं, बल्कि उनका आदर सत्कार तो आप दिल से हमेशा कर सकते हैं। गुरु का अपमान मां का अपमान करने के समान माना जाता है।
इसी प्रकार शिक्षकों को भी इस बात को समझना होगा कि वे छात्रों के जीवन में रोशनी फैला कर उन्हेंं सही दिशा दिखाते हैं और उनका आचरण एवं व्यवहार ता-उम्र बच्चों का मार्ग दर्शन करता है। भले ही आज कंप्यूटर युग हो, फिर भी विद्यार्थी सबसे ज्यादा विश्वास अपने शिक्षक की बताई बात पर ही करता है।
यदि किसी बच्चे से पूछें कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहता है तो उसका यही जवाब होगा कि उसे अपने टीचर जैसा बनना है। सो शिक्षकों को अपनी छवि फिर से ऐसी बनानी होगी कि उनका सम्मान हर पल, हर दिन और हर समय हो तभी तो ज्ञान का भंडार देने वाले शिक्षकों को सही मायने में एक बार फिर दिल से पूजा जाएगा।

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