International Women's Day : A Housewife Does Not Have a Women's Day : एक गृहणी का नहीं होता कोई महिला दिवस

A Housewife Does Not Have a Women's Day : एक गृहणी का नहीं होता कोई महिला दिवस 

International Women's Day 
इंटरनेशनल  वीमेन डे के दिन खुद को स्पैशल महसूस का अहसास, एक ओहदे पर पहुंचने का अभिमान, इसे खास तरीके से मनाने का उल्लास एवं इस दिन आयोजित होने वाले समारोहों में शिरकत करने का उत्साह जितना कामकाजी महिलाओं में जितना देखा जाता है, उसका एक अंश भर भी घरेलू महिला अर्थात हमेशा घर पर रहने वाली गृहणी में देखने को नहीं मिलता। सुबह से लेकर रात तक उसका हर पल अपने पति, बच्चों और परिवार को ही समर्पित  होता है तथा रविवार का अवकाश, त्यौहार या महिला दिवस उसके लिए आम दिनों से भी ज्यादा व्यस्तता भरे दिन हो जाते हैं। 

यदि आप उनसे पूछें भी कि वे महिला दिवस कैसे मनाती हैं, तो वे यही कहेंगी, घर का काम निपटाने के बाद उनके पास जो थोड़ा सा वक्त मिलता है, उसमें उस दिन का अखबार पढ़ते हुए या टीवी देखते हुए ही उन्हें पता चल पाता है कि आज महिला दिवस भी है या फिर सोशल मीडिया पर आए हुए बधाई संदेश ही बताते हैं कि आज का दिन कितना खास है और वे उनका जवाब देते हुए ही उस दिन को मना लेती हैं। कहीं न कहीं उन्हें लगता है कि महिला दिवस तो उन पढ़ी-लिखी महिलाओं का है, जिन्होंने घर की चार दीवारी से बाहर निकल कर सफलता के परचम लहराए हैं।

यदि आप चाहें तो कुछ कदम उठा कर अपनी पत्नी को केवल महिला दिवस पर ही नहीं बल्कि हर दिन स्पैशल फील करा सकते हैं।

A Housewife Does Not Have a Women's Day : एक गृहणी का नहीं होता कोई महिला दिवस 

सम्मान से जगे आत्मविश्वास 

दुनिया में अपना मुकाम पा कर परचम लहराने वाली महिलाओं से लेकर घर पर रहने वाली महिलाएं भी अपने लिए बस यही चाहती हैं कि घर से ले कर बाहर तक लोगों की निगाहों में, उनके व्यवहार में और बातों में महिलाओं के लिए सही मायने में सम्मान झलकना चाहिए। खुद को मिलने वाला सम्मान ही उनमें आत्मविश्वास को भर देता है।

चाहिए बस आगे बढऩे का अवसर

एक गृहणी हर समय अपने परिवार, पति और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में ही लगी रहती है और अपने लिए वक्त ही नहीं निकाल पाती, यदि कभी कुछ सीखने या करने को मन करता भी है, तो उसे यह कह कर रोक दिया जाता है कि इन सबसे परिवार के बाकि लोगों के काम पर असर पड़ेगा और बच्चों एवं घर की सही से देखभाल नहीं हो पाएगी। ऐसे में यदि हम लोग भी अपना नजरिया बदल कर उसे आगे बढऩे का अवसर दें, तो उसमें भी खास होने का अहसास अपने आप जागृत हो जाएगा।

देवी की जगह इंसान समझें

एक नारी को हमेशा त्याग और बलिदान की मूर्ति ही कहा जाता है, वास्तव में एक नारी त्याग और बलिदान ही नहीं अपितु प्रेम और समर्पण भी जानती है, अपने जीवन साथी एवं परिवार के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलना भी जानती है, जरूरत पडऩे पर हर तूफान से टकराना भी जानती है और अपना जीवन खुशी से न्यौछावर करना भी जानती है अर्थात उसकी काबलियत पर किसी भी तरह का शक नहीं किया जा सकता है, अत: उसे देवी की अपेक्षा इंसान ही समझना चाहिए, क्योंकि उसके भी अपने सपने होते हैं, कुछ कर गुजरने की तमन्ना होती है।

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उसके कामों में हाथ बंटाएं

भले ही महिला घर रहती है, परंतु उसके जिम्मे बहुत सारे काम होते हैं, ऐसे में पति घर के काम में यदि थोड़ी सी भी मदद कर दे तो उसे काफी सहारा हो जाता है, अपने ही घर के काम करने में या अपने ही छोटे बच्चे का डाइपर बदलने में शर्म किस बात की, बल्कि ऐसा कर के आप अपनी पत्नी को सुकून के दो पल ही देंगे।

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